
Written by
Dilip Singh Gour Bureau
– “जानवर मरकर भी इंसानों के काम आते हैं, तो मेरी देह क्यों नहीं ?”— 72 वर्षीय परशुराम पंवार का देहदान संकल्प
– मृत्यु के बाद भी किसी की जिंदगी संवारने की चाह, परशुराम पंवार ने देह की अंतिम मंजिल तय कर दी”
सैलाना। श्राद्ध पक्ष में लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में दान-पुण्य करते हैं, लेकिन सैलाना में इस बार एक ऐसा महादान हुआ है, जिसकी उपयोगिता मृत्यु के बाद भी बनी रहेगी। भूरामल कॉलोनी निवासी 72 वर्षीय परशुराम पंवार ने अपनी देह मानव कल्याण के लिए समर्पित करने का संकल्प लि“जिस देह को एक दिन मिट्टी में मिलना था, उसे ज्ञान को सौंप गए परशुराम”या है। सैलाना क्षेत्र में देहदान का यह पहला संकल्प बताया जा रहा है।
डिप्लोमा मैकेनिकल इंजीनियर पंवार के मन में लंबे समय से एक सवाल उठ रहा था — “इंसान जब तक जीवित है, तब तक पुण्य कर्म कर सकता है। लेकिन मृत्यु के बाद शरीर की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती। जानवर मरने के बाद भी इंसानों के काम आते हैं। उनकी चमड़ी से जूते-चप्पल बनते हैं, उनके दांत तक उपयोग में आते हैं। तो क्या हम इंसान अपनी देह का उपयोग मानव कल्याण में नहीं कर सकते ?”यही सवाल धीरे-धीरे संकल्प में बदल गया और पंवार ने तय किया कि मृत्यु के बाद उनकी देह अग्नि में विलीन होने के बजाय मेडिकल विद्यार्थियों के अध्ययन और चिकित्सा शिक्षा के काम आए।

– अपनों की सहमति से लिया जीवन का सबसे बड़ा फैसला
पत्नी रंजना पंवार, पुत्र मंजूनाथ और पुत्रियों वैशाली एवं वंदना की सहमति के बाद देहदान का संकल्प पत्र भरा गया। काकानी सोशल वेलफेयर फाउंडेशन के सचिव गोविंद काकानी अपने मित्र विपिन श्रीमाल के साथ सैलाना पहुंचे। परिवार, पत्रकारों और गणमान्य नागरिकों की मौजूदगी में संकल्प एवं पंजीयन की प्रक्रिया पूरी हुई।
गोविंद काकानी ने देहदान की प्रक्रिया और मेडिकल शिक्षा में इसके महत्व की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पार्थिव देह मेडिकल विद्यार्थियों के अध्ययन में उपयोगी होती है और भावी डॉक्टरों को मानव शरीर की संरचना समझने में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहता है।
– दामाद के लिए भी गर्व का क्षण
परशुराम पंवार पत्रकार मनोज भंडारी के ससुर हैं। ससुर के इस निर्णय को लेकर भंडारी के लिए यह क्षण व्यक्तिगत भावनाओं के साथ-साथ सामाजिक सम्मान का भी विषय बना। जिस व्यक्ति ने जीवन भर समाज को खबरों के माध्यम से आईना दिखाया, उसी परिवार से मृत्यु के बाद भी समाज के काम आने वाला ऐसा संकल्प सामने आना निश्चित रूप से गर्व का विषय है।
पंवार का जन्म कर्नाटक के बागलकोट में हुआ। इसके बाद उन्होंने गोवा और मध्यप्रदेश के राऊ में जीवन बिताया और वर्तमान में सैलाना में निवासरत हैं। वे बचपन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं।
– मृत्यु के बाद भी मिलेगा सम्मान
इस अवसर पर गोविंद काकानी ने शासन की ओर से देहदान के बाद होने वाली सम्मान प्रक्रिया की भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मृत्यु के बाद जब मेडिकल कॉलेज की टीम पार्थिव देह लेने पहुंचती है, तो पुलिस विभाग द्वारा सम्मान स्वरूप गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया जाता है।
देहदान का संकल्प डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडे मेडिकल कॉलेज रतलाम के शरीर रचना विभागाध्यक्ष राजेंद्र सिंगरौले के माध्यम से डीन डॉ. अनीता मूथा को सौंपा जाएगा।
इस अवसर पर धर्मेन्द्र शिकारी, मोतीलाल मालवीय, गोपाल कुमावत, पप्पी मिश्रा, अशोक क्षोत्रिय सहित नगर के पत्रकार और परिवारजन मौजूद रहे। आभार मनोज भंडारी ने माना।
– शायद इससे बड़ी अंतिम विदाई कोई नहीं…
परशुराम पंवार का यह संकल्प सिर्फ देहदान का कागज नहीं है। यह उस सोच का नाम है जिसमें इंसान अपनी अंतिम सांस के बाद भी किसी अनजान विद्यार्थी की पढ़ाई, किसी भावी डॉक्टर के ज्ञान और शायद किसी अनजान मरीज की जिंदगी में अपना योगदान छोड़ जाना चाहता है।
– शरीर एक दिन मिट्टी में मिलना है…
लेकिन यदि वही शरीर किसी डॉक्टर को सीखने में मदद कर दे, तो शायद मृत्यु के बाद भी इंसान की एक छोटी-सी जिंदगी किसी और के जीवन में सांस लेती रहती है। परशुराम पंवार ने अपनी अंतिम यात्रा की मंजिल अभी से तय कर दी है —
जहां विदाई के बाद उनकी देह खामोश नहीं होगी, बल्कि किसी नए डॉक्टर के ज्ञान में बोलती रहेगी।
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“मौत के बाद भी खत्म









