
नई दिल्ली, दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट ने देशभर के शिक्षण संस्थानों में जॉब-ओरिएंटेड (रोजगारोन्मुख) पाठ्यक्रमों के लिए नई नीति बनाने की मांग संबंधी जनहित याचिका (PIL) पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि शिक्षा नीति तैयार करना और पाठ्यक्रमों को लेकर निर्णय लेना सरकार का नीतिगत विषय है, इसलिए न्यायालय इस संबंध में कोई निर्देश जारी नहीं कर सकता।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत इस मांग पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती, क्योंकि यह पूरी तरह नीति निर्माण से जुड़ा विषय है। हालांकि पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में पहले से ही कई ऐसे प्रावधान मौजूद हैं, जिनके माध्यम से छात्रों को रोजगारोन्मुख और व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है।
यह जनहित याचिका सुनील कुमार शर्मा द्वारा दायर की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि देश के स्कूलों, कॉलेजों और अन्य शिक्षण संस्थानों में ऐसे पाठ्यक्रमों के लिए स्पष्ट नीति बनाई जाए, जो छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के बाद सीधे रोजगार के लिए तैयार कर सकें। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप व्यावहारिक और कौशल आधारित पाठ्यक्रमों को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ सकें।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में पहले से ही अनेक सरकारी योजनाओं और नीतियों के माध्यम से सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण, कौशल विकास और रोजगारोन्मुख शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है। ऐसे में नई नीति बनाने का निर्णय पूरी तरह सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और इस विषय पर अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
हालांकि हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पूरी तरह निराश नहीं किया। अदालत ने उन्हें सलाह दी कि वे अपनी मांग और सुझाव संबंधित सरकारी विभागों तथा नीति निर्माताओं के समक्ष रखें। अदालत ने यह भी कहा कि सरकार को याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दों और शिकायतों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए तथा नियमानुसार उचित निर्णय लेना चाहिए।
खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि सरकार जब इस विषय पर कोई निर्णय ले, तो उसकी जानकारी याचिकाकर्ता को भी उपलब्ध कराई जाए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि उनकी शिकायत और सुझावों पर उचित स्तर पर विचार किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते रोजगार बाजार में कौशल आधारित और जॉब-ओरिएंटेड शिक्षा की मांग लगातार बढ़ रही है। सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल मार्केटिंग, स्वास्थ्य सेवाएं, ऑटोमेशन और अन्य उभरते क्षेत्रों में प्रशिक्षित युवाओं की आवश्यकता पहले की तुलना में अधिक हो गई है। इसी कारण सरकार भी समय-समय पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति और कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से रोजगारोन्मुख शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है।
फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जॉब-ओरिएंटेड पाठ्यक्रमों के लिए नई नीति बनाना न्यायपालिका नहीं, बल्कि सरकार का नीतिगत निर्णय है। अब यह सरकार पर निर्भर करेगा कि वह याचिकाकर्ता के सुझावों और मांगों पर किस प्रकार विचार करती है और भविष्य में इस दिशा में कोई नई पहल करती है या नहीं।










