
गरीब परिवारों की बेदखली के मामले में नगर निगम को नोटिस, तीन सप्ताह में जवाब तलब

रतलाम। जावरा रोड की झोपड़पट्टियों से डोसीगांव स्थित प्रधानमंत्री आवास योजना के बहुमंजिला भवनों के ईडब्ल्यूएस फ्लैटों में शिफ्ट किए गए गरीब परिवारों की बेदखली के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अगली सुनवाई तक वर्तमान स्थिति यथावत बनाए रखने (स्टेटस क्वो) का आदेश दिया है। न्यायालय ने नगर निगम सहित प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने रिट पिटीशन क्रमांक 33635/2026, रंम्बा बाई एवं अन्य बनाम मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य की सुनवाई के दौरान 20 अगस्त 2026 को पारित किया। आदेश में दर्ज है कि याचिकाकर्ता प्रत्येक ₹1.80 लाख जमा करने के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्हें संबंधित परिसर से पहले ही बेदखल किया जा चुका है। इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने अगली सुनवाई तक वर्तमान स्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अंशुमन श्रीवास्तव, नवेंदु जोशी तथा रोहित शर्मा ने पक्ष रखा।
झोपड़पट्टियों से मल्टी में किया गया था शिफ्ट
जावरा रोड की झोपड़पट्टियों में लंबे समय से रह रहे अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को डोसीगांव की मल्टी में ईडब्ल्यूएस फ्लैट आवंटित किए गए थे। इन परिवारों से मार्जिन मनी के रूप में ₹20 हजार जमा कराई गई थी तथा शेष राशि के लिए बैंक ऋण उपलब्ध कराने का नगर निगम द्वारा आश्वासन दिए जाने की बात याचिकाकर्ताओं ने कही है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, नगर निगम ने कुछ हितग्राहियों को बैंक ऋण दिलाने की पहल की, लेकिन सभी प्रभावित परिवारों के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकी। आर्थिक रूप से कमजोर कई परिवार ₹20 हजार की राशि भी स्वयं जमा नहीं कर सके। ऐसे परिवारों को विधायक की ओर से ₹10 हजार की सहायता मिलने की बात भी सामने आई है।
208 फ्लैटधारियों को दिया गया था नोटिस
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 31 जुलाई को नगर निगम द्वारा 208 फ्लैटधारियों को तीन दिन के भीतर ₹1.80 लाख जमा करने का नोटिस दिया गया। इसके बाद 5 अगस्त को उनके सामान फ्लैटों से बाहर निकालकर फ्लैटों पर ताले लगा दिए गए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उस समय तक उनका आवंटन निरस्त नहीं किया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के समक्ष कहा कि यदि उन्हें ₹1.80 लाख का बैंक ऋण उपलब्ध कराया जाता है तो वे यह राशि नगर निगम को जमा करने के लिए तैयार हैं। न्यायालय के आदेश में भी प्रत्येक याचिकाकर्ता द्वारा ₹1.80 लाख जमा करने की तैयारी का उल्लेख है।
सकलेचा बोले—प्रशासनिक कमी की सजा गरीबों को क्यों?
पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने कहा कि नगर निगम को गरीब हितग्राहियों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए बैंक ऋण उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी पहल करनी चाहिए थी। यदि निगम के स्तर पर बैंकों से ऋण दिलाने की व्यवस्था समय पर की जाती तो गरीब परिवार शेष राशि जमा कर सकते थे और यह स्थिति पैदा नहीं होती। सकलेचा ने कहा कि एक ओर गरीब परिवारों को फ्लैटों से बेदखल कर दिया गया और दूसरी ओर उनके आवंटन को निरस्त करने की कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि बैंक ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था नगर निगम की जिम्मेदारी के अनुरूप समय पर नहीं हो सकी, तो उसकी प्रशासनिक कमी की सजा गरीब हितग्राहियों को क्यों दी जा रही है?
हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने को कहा है। फिलहाल न्यायालय ने अगली सुनवाई तक डोसीगांव स्थित संबंधित फ्लैटों के संबंध में वर्तमान स्थिति यथावत रखने के आदेश दिए हैं।











