
नगर परिषद के चुनाव में अभी करीब एक साल बाकी है, लेकिन सियासी हलचल ने धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ना शुरू कर दिया है। बाहर से भले ही सब कुछ सामान्य नजर आ रहा हो, लेकिन कई नेताओं के मन में अध्यक्ष पद की घंटियां बजने लगी हैं।
किसी नेता से अगर पूछ लो कि “चुनाव लड़ने का मन है क्या?” तो जवाब आता है—“अभी तो ऐसा कुछ सोचा नहीं है… पार्टी जो तय करेगी, वही होगा।” चेहरे पर संकोच, जुबान पर ना-नुकुर और मन में शायद लड्डू ही लड्डू!
राजनीतिक गलियारों में इन दिनों कुछ चेहरे चुपचाप ‘गोपनीय जनसंपर्क’ में जुटे नजर आ रहे हैं। खुलकर दावा कोई नहीं कर रहा, लेकिन लोगों से मुलाकात, कार्यक्रमों में मौजूदगी और सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता बहुत कुछ इशारा कर रही है।
मजे की बात तो यह है कि चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले कई चेहरे सवाल पूछे जाने पर अपनी मंशा जाहिर करने से बच रहे हैं। लेकिन जब कहीं उनके नाम की चर्चा होती है तो चेहरे के भाव और गर्दन का हल्का सा हिलना मानो कह देता है—
“मने भाए… ओर मुंडो हिलाए!”
मन में शायद यही चल रहा है कि “चर्चा तो हो रही है, मतलब जनता के बीच नाम तो पहुंच रहा है!”

हालांकि जनता अब काफी समझदार और परिपक्व हो चुकी है। नगरवासी ऐसे चेहरे की तलाश में हैं, जो सिर्फ कुर्सी का सपना न देखे, बल्कि जनता के सुख-दुःख में खड़ा रहे और नगर की समस्याओं को समझकर समाधान की लड़ाई लड़े।
कुछ चेहरे ऐसे भी हैं, जिन्हें किसी चुनावी प्रचार की जरूरत नहीं। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के लोगों के बीच अपनी जगह बनाई है और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है।
अब चुनाव में एक साल बाकी है…
दावेदार अभी चुप हैं, लेकिन सपने बोलने लगे हैं।
जुबान पर ‘ना’ है, मगर मन में लड्डू फूट रहे हैं!











